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Thursday, March 13, 2008

चाहत की राह में ठोकर खाने से डरता हूँ

चाहत की राह में ठोकर खाने से डरता हूँ
हसीं खवाब के बिखर जाने से डरता हूँ

मोहब्बत करता हूँ उन्हें दिल की गहराइयों से
ज़ख्मों के दिल पर उभर जाने से डरता हूँ

बहुत दूर है वो दिल के करीब रहने वाले
सफर में मौसम के बदल जाने से डरता हूँ

ज़िंदगी के गुलशन में एक फूल खिला है
खिज़ा की नज़र लग जाने से डरता हूँ

उनका साथ छूटता जा रहा है
"अली" फिर उसी तन्हाई से डरता हूँ...

अली.
...ज़रूरी तो नही, के बताये लबों से दास्तान अपनी,
ज़बान एक और भी होती है इजहार की...
यूँ तो कोई तनहा नही होता,
चाह कर भी कोई जुदा नही होता,
मोहब्बत को तो मजबूरियाँ ही ले डूबती है,
वरना खुशी से कोई बेवफा नही होता...

Unknown

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